बच्चे तो बच्चे, बाप रे बाप : रवीन्द्र प्रभात के हाइकु
(एक) भागते बच्चे हवा से होड़ लेके बदहवास। (दो) रार ठानूंगा जाऊंगा शिखर पे मैं न मानूंगा । (तीन) उम्मीद रख समर को जीतके आन...
बच्चे तो बच्चे, बाप रे बाप : रवीन्द्र प्रभात के हाइकु
(एक) भागते बच्चे हवा से होड़ लेके बदहवास। (दो) रार ठानूंगा जाऊंगा शिखर पे मैं न मानूंगा । (तीन) उम्मीद रख समर को जीतके आन...
सुबह-ए-बनारस
एक कविता करतालों की जगह बजने लगा है पाखण्ड अन्धविश्वास रुढियों को कंधे पे लटकाए सीढियां चढ़ रहा है चट्ट चट्ट लज्जित है सुबह क...
इस कविता का एक-एक शब्द अनमोल है...!
मैंने हमेशा एक फकीरी ज़िन्दगी जी है, 'क्यूँ' मेरे शब्दकोष में कभी नहीं रहा......यह 'क्यूँ' बस दूर करता है. अमृता मेरी जिं...